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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 4
केनाभ्यसूया पदकाङ्गिणा ते नितान्तदीर्थैर्जनिता तपोभिः । यावद्भवत्याहितसायकस्य मत्कार्मुकस्यास्य निदेशवर्ती ॥
आपके इस धनुष के आदेश का पालन करते हुए मेरे बाणों के लक्ष्य में रहते हुए, किसने आपके प्रति ईर्ष्या उत्पन्न की है, जो दीर्घ तप से उत्पन्न हुई है?
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