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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 32
चूताङ्करास्वादकषायकण्ठः पुंस्कोकिलो यन्मधुरं चुकूज । मनस्विनीमानविघातदक्ष तदेव जातं वचनं स्मरस्य ॥
आम की कोंपलों का रस पीकर कंठ में कषाय लिए नर कोकिल ने जो मधुर कूक की, वह मनस्विनी स्त्रियों के मन को विचलित करने में समर्थ कामदेव के वचन के समान हो गई।
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