प्रियाल की मंजरी के रजकणों से दृष्टि धुँधली हो जाने पर भी मदोन्मत्त मृग वायु के विपरीत दिशा में वनस्थलियों में घूमते रहे और पत्तों की सरसराहट उत्पन्न करते रहे।
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