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कुमारसंभवम् • अध्याय 3 • श्लोक 17
गुरोर्नियोगाच्च नगेन्द्रकन्या स्थाणुं तपस्यन्तमधित्यकायाम् । अन्वास्त इत्यप्सरसां मुखेभ्यः श्रुतं मया मत्प्रणिधिः स वर्गः ॥
और गुरु के आदेश से पर्वतराज की कन्या उस तप करते हुए शिव की सेवा में लगी है, यह मैंने अप्सराओं के मुख से सुना है, जो मेरे दूत हैं।
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