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कुमारसंभवम् • अध्याय 2 • श्लोक 56
वृतं तेनेदमेव प्रायया चास्मै प्रतिश्रुतम् । वरेण शमितं लोकानलं दग्धुं हि तत्तपः ॥
उसने यही वर माँगा था और उसे यह वचन दिया गया था कि उसका तप लोकों को जलाने वाली अग्नि को भी शांत कर देगा।
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