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कुमारसंभवम् • अध्याय 2 • श्लोक 47
उच्चैरुच्चैः श्रवास्तेन हयरत्नमहारि च । देहबद्धमिवेन्द्रस्य चिरकालार्जितं यशः ॥
उसने इन्द्र का उच्चश्रवा नामक रत्नघोड़ा छीन लिया है, मानो इन्द्र के लंबे समय से अर्जित यश को ही शरीर से अलग कर लिया हो।
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