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कुमारसंभवम् • अध्याय 2 • श्लोक 46
यज्वभिः सम्भृतं हव्यं विततेष्वध्वरेषु सः । जातवेदोमुखान्मायी मिषतामाच्छिनत्ति नः ॥
यज्ञों में यजमानों द्वारा एकत्र किया गया हव्य वह मायावी हमारी आँखों के सामने अग्नि के मुख से छीन लेता है।
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