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कुमारसंभवम् • अध्याय 2 • श्लोक 38
ज्वलन्मणिशिखाश्चैनं वासुकिप्रमुखा निशि । स्थिरप्रदीपतामेत्य भुजङ्गाः पर्युपासते ॥
वासुकि आदि सर्प अपने मणियों की ज्वाला से रात्रि में दीपक बनकर उसकी सेवा करते हैं।
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