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कुमारसंभवम् • अध्याय 2 • श्लोक 12
उद्घातः प्रणवो यासां न्यायैस्त्रिभिरुदीरणम् । कर्म यज्ञः फलं स्वर्गस्तासां त्वं प्रभवो गिराम् ॥
जिन वाणियों में प्रणव का उच्चारण तीन विधियों से होता है, जिनका कर्म यज्ञ है और फल स्वर्ग है, उन सबका मूल आप ही हैं।
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