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कुमारसंभवम् • अध्याय 2 • श्लोक 11
द्रवः सङ्घातकठिनः, स्थूलः सूक्ष्मो लघुर्गुरुः । व्यक्तो व्यक्तेतरश्चासि प्राकाम्यं ते विभूतिषु ॥
आप द्रव और कठोर, स्थूल और सूक्ष्म, हल्के और भारी, व्यक्त और अव्यक्त सब रूपों में स्थित हैं; यही आपकी विभूतियों का वैभव है।
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