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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 7
दृष्टिप्रपातवशतोऽपि पुरारिसूनो-स्ते नागपाशघनबन्धविपत्तिदुःखात् । इन्द्रादयो मुमुचिरे स्वयमस्य देवाः सेवां व्यधुर्निकटमेत्य महाजिगीषोः ॥
पुरारि के पुत्र की दृष्टि पड़ते ही वे नागपाश से मुक्त हो गए और इन्द्र आदि देवता उसके पास आकर सेवा करने लगे।
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