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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 54
पुलकभरविभिन्नवारबाणा भुजविभवं बहु तारकस्य शत्रोः । सकलसुरगणा महेन्द्रमुख्याः प्रमदमुखच्छविसम्पदोऽभ्यनन्दन् ॥
तारकासुर के शत्रु कार्त्तिकेय के महान् भुजबल की प्रशंसा करते हुए, इन्द्र आदि समस्त देवता अत्यन्त हर्षित होकर उनका अभिनंदन करने लगे।
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