मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 53
स्वर्गापगासलिलसीकरिणी समन्तात् सौरभ्यलुब्धमधुपावलिसेव्यमाना । कल्पद्रुमप्रसववृष्टिर भून्नभस्तः शम्भोः सुतस्य शिरसि त्रिदशारिशत्रोः ॥
चारों ओर स्वर्गगंगा के जलकणों से सिंचित और सुगंध से आकर्षित भौंरों द्वारा सेवित कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आकाश से शिवपुत्र के ऊपर होने लगी।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुमारसंभवम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुमारसंभवम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें