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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 51
शक्त्या हृतासुमसुरेश्वरमापतन्तं कल्पान्तवातहतभिन्नमिवाद्रिश्ङ्गम् । दृष्ट्वा प्ररुढपुलकाश्चितचारुदेहा देवाः प्रमोदमगमंस्त्रिदशेन्द्रमुख्याः ॥
शक्ति से प्राणहरित होकर गिरते हुए दैत्यराज को, प्रलयकालीन वायु से टूटे पर्वतशिखर के समान देखकर, इन्द्र आदि देवता हर्ष से पुलकित हो उठे।
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