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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 5
दैत्येश्वरो ज्वलितरोषविशेषभीमः सद्यो मुमोच युधि यान्विशिखान्सहेलः । ते प्रापुरुद्भटभुजङ्गमभीमभावं गाढं बबन्धुरपि तांस्त्रिदशेन्द्रमुख्यान् ॥
क्रोध से प्रज्वलित दैत्यराज ने सहज ही ऐसे बाण छोड़े जो भयानक सर्पों के समान होकर इन्द्र आदि देवताओं को कसकर बाँधने लगे।
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