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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 48
भ्रूभङ्गभीषणमुखोऽसुरचक्रवर्ती सन्दीप्तकोपदहनोऽथ रथं विहाय । क्रीडत्करालकरवालकरोऽसुरेन्द्र-स्तं प्रत्यधावद्भितस्त्रिपुरारि सूनुम् ॥
भौंहों के विकार से भयानक मुख वाला दैत्यराज, क्रोधाग्नि से दहकता हुआ, रथ छोड़कर तलवार लेकर कार्त्तिकेय की ओर दौड़ा।
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