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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 46
दैत्योऽपि रोषकलुषो निशितैः क्षुरप्रै-राकर्णकृष्टधनुरुत्पतितैः स भीमैः । तद्भीतिविद्रुतसमस्तसुरेन्द्रसैन्यं गाढं जघान मकरध्वजशत्रुसूनुम् ॥
क्रोध से भरे दैत्य ने कान तक खींचे गए धनुष से छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों द्वारा भयभीत होकर भागती देवसेना को और कार्त्तिकेय को तीव्र प्रहार से आहत किया।
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