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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 40
इत्यग्निना घनतरेण ततोऽभिभूतं तद्देवसैन्यमखिलं विकलं विलोक्य । सस्मेरवक्रकमलोऽन्धकशत्रुसूनु-र्वाणासनेन समधत्त स वारुणास्त्रम् ॥
इस प्रकार अग्नि से पीड़ित और व्याकुल देवसेना को देखकर, मुस्कराते हुए कार्त्तिकेय ने अपने धनुष पर वारुणास्त्र चढ़ाया।
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