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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 4
तान्प्रज्वलत्फलमुखैर्विषमैः सुरारि-नामाङ्कितैः पिहितदिग्गगनान्तरालैः । आच्छादितस्तृणचयानिव हव्यवाह-श्चिच्छेद सोऽपि सुरसैन्यशराज्यशरौघैः ॥
सुरशत्रु के अग्निमुख बाणों से दिशाएँ ढक गईं, किन्तु देवसेना के बाणों ने उन्हें ऐसे काट दिया जैसे अग्नि तृणों को भस्म कर देती है।
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