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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 38
उज्जागरस्य दहनस्य निरर्गलस्य ज्वालावलीभिरतुलाभिरनारताभिः । कीर्ण पयोद‌निवहैरिव धूमसबै-व्र्योमाभ्यलक्ष्यत कुलैस्तडितामिवोच्चैः ॥
उस अनियंत्रित अग्नि की ज्वालाएँ निरंतर उठती रहीं और धुएँ के समूहों से आकाश मेघों में चमकती बिजली के समान दिखाई देने लगा।
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