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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 37
जज्वाल वह्निरतुलः सुरसैनिकेषु कल्पान्तकालदद्दनप्रतिमः समन्तात् । आशामुखानि विमलान्यखिलानि कीलाजालैरलं कपिलयन्सकलं नभोऽपि ॥
अग्नि देवसेना में प्रलयकालीन अग्नि के समान चारों ओर प्रज्वलित हो उठी और अपनी ज्वालाओं से समस्त दिशाओं और आकाश को लाल कर दिया।
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