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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 36
दिकक्रवालगिलनैर्मलिनैस्तमोभि-र्लिप्तं नभःस्थलमले घनवृन्दसान्द्रैः । धूमैर्विलोक्य मुदिताः खलु राजहंसा गन्तुं सरः सपदि मानसमीषुरुच्चैः ॥
धुएँ से ढके आकाश को देखकर राजहंस प्रसन्न होकर उसे मानसरोवर समझकर वहाँ जाने लगे।
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