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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 30
तास्ताः खरेण मरुता रथराजयोऽपि दोधूयमाननिपतिष्णुतुरङ्गमाश्च । विस्त्रस्तसारथिकुलप्रवराः समन्ताद् व्यावृत्य पेतुरवनौ सुरवाहिनीनाम् ॥
उस प्रचंड वायु से रथ और घोड़े डगमगाकर गिर पड़े और भयभीत सारथी चारों ओर भागकर भूमि पर गिरने लगे।
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