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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 29
धूतानि तेन सुरसैन्यमहागजानां सद्यः शतानि विधुराणि दलत्कुथानि । पेतुः क्षितौ कुपितवासववज्रलून-पक्षस्य भूधरकुलस्य तुलां वहन्ति ॥
उस वायु से देवसेना के अनेक हाथी गिर पड़े, मानो इन्द्र के वज्र से कटे हुए पर्वत पृथ्वी पर गिर रहे हों।
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