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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 28
विध्वस्य तेन सुरसैन्यमहापताका नीता नभस्थलमलं नवमल्लिकाभाः । स्वर्गापगाजलमहौघसहखलीला व्यातेनिरे दिवि सिताम्बरकैतवेन ॥
उस वायु से देवसेना के ध्वज टूटकर आकाश में फैल गए और वे नवमल्लिका के पुष्पों के समान प्रतीत होने लगे।
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