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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 27
कुन्दोज्जवलानि सकलातपवारणानि धूतानि तेन मरुता सुरसैनिकानाम् । उड्डीयमान कलहंसकुलोपमानि मेघाभधूलिमलिने नभसि प्रसस्नुः ॥
उस प्रचंड वायु से देवसेना के श्वेत छत्र उड़ गए और धूल से भरे आकाश में वे हंसों के झुंड जैसे दिखाई देने लगे।
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