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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 25
अह्नाय कोपकलुषो विकटं विहस्य व्यर्थां समर्थ्य वरशस्त्रयुधं कुमारे । जिष्णुर्जगद्विजयदुर्ललितः सहेलं वायव्यमस्वमसुरो धनुषि न्यधत्त ॥
क्रोध से विकृत होकर दैत्य ने हँसते हुए, कार्त्तिकेय के शस्त्रों को तुच्छ समझकर अपने धनुष पर वायव्यास्त्र चढ़ा दिया।
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