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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 21
बाणैः सुरारिधनुषः प्रसृतैरनन्तै-निर्घोषभीषितभटो लसदंशुजालैः । अन्धीकृताखिलसुरेश्वरसैन्य ईश-सूनुः कुतोऽपि विषयं न जगाम दृष्टेः ॥
सुरशत्रु के अनन्त बाणों की गर्जना से भयभीत होकर और उनकी चमक से आच्छादित होकर सम्पूर्ण देवसेना अंधकारमय हो गई, जिससे शिवपुत्र की दृष्टि कहीं स्थिर न हो सकी।
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