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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 20
कर्णान्तमेत्य दितिजेन विकृष्यमाणं कोदण्डमेतद‌र्भित सुषुवे शरौघान् । व्योमाङ्गणे लिपिकरान्कि रणप्ररोहैः सान्द्रैरशेषककुभां पलितं करिष्णून् ॥
दैत्य द्वारा कान तक खींचे गए धनुष से छोड़े गए बाणों की वर्षा ने आकाश को भर दिया, मानो सभी दिशाएँ श्वेत रेखाओं से अंकित हो गई हों।
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