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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 16
इत्थं निशम्य वचनं युधि तारकश्च कम्माधरो विकचकोकनदारुणाक्षः । क्षोभात्त्रिलोचनसुतो धनुरीक्षमाणः प्रोवाच वाचमुचितां परिमृश्च शक्तिम् ॥
इस प्रकार के वचन सुनकर, क्रोध से भरे हुए कार्त्तिकेय ने धनुष उठाते हुए उचित उत्तर दिया।
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