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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 10
तत्स्यन्दनः सपदि सारथिसम्प्रणुन्नः प्रक्षुब्धवारिधरधीरगभीरघोषः । चण्डश्चचाल दलिताखिलशत्रुसैन्य-मांसास्थिशोणितविपङ्कविलुप्तचक्रः ॥
सारथि द्वारा चलाया गया उसका रथ प्रचंड गर्जना करता हुआ आगे बढ़ा, जिसके पहिए शत्रुसेना के मांस, अस्थि और रक्त के कीचड़ में लिप्त हो गए थे।
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