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कुमारसंभवम् • अध्याय 17 • श्लोक 1
दृष्ट्वाभ्युपेतमथ दैत्यपतिं पुरस्ता-त्सङ्ग्रामकेलिकुतुकेन घनप्रमोदम् । योद्धुं मदेन मिमिलुः ककुभामधीशा बाणान्धकारितदिगम्बरगर्भमेत्य ॥
सामने आए दैत्यराज को देखकर दिशाओं के अधिपति युद्ध के उत्साह और हर्ष से भरकर, बाणों से अंधकारमय आकाश में प्रवेश कर उससे लड़ने लगे।
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