तुरङ्गसादिनं शस्त्रहृतप्राणं मतं भुवि । अबद्धोऽपि महावाजी न साश्रुनयनोऽत्यजत् ॥
घोड़े का स्वामी शस्त्र से मारा गया, फिर भी वह महान घोड़ा, आँखों में आँसू लिए, उसे छोड़कर नहीं गया।
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