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कुमारसंभवम् • अध्याय 16 • श्लोक 42
द्विषा प्रासहृतप्राणो वाजिपृष्ठदृढासनः । हस्तोद्धृतमहाप्रासो भुवि जीवन्निवाभ्रमत् ॥
शत्रु के भाले से प्राण त्याग देने पर भी वह घोड़े पर दृढ़ बैठा हुआ, हाथ में भाला लिए, मानो जीवित ही पृथ्वी पर घूमता रहा।
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