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कुमारसंभवम् • अध्याय 16 • श्लोक 22
शस्त्रभिन्नेभकुम्भेभ्यो मौक्तिकानि च्युतान्यधः । अध्याहवक्षेत्रमुप्तकीर्तिबीजाङ्करश्रियम् ॥
हाथियों के मस्तक के फटने से गिरे मोती रणभूमि में ऐसे प्रतीत होते थे मानो कीर्ति के बीज बोए जा रहे हों।
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