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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 45
मनोतिवेगेन रथेन सारथिप्रणोदितेन प्रचलन्महासुरः । ततः प्रपेदे सुरसैन्यसागरं भयंङ्कराकारमपारमग्रतः ॥
सारथि द्वारा प्रेरित मन की गति से भी तीव्र रथ पर चलता हुआ वह महादैत्य देवसेना रूपी असीम और भयानक समुद्र के समीप पहुँचा।
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