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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 44
ततोऽवलेपाद्विकर्ट विहस्य स व्यवत्त कोशादसिमुत्तमं बहिः । रथं द्रुतं प्रापय वासवान्तिकं नन्वित्यवोचन्निजसारथिं रथी ॥
तब अहंकार से हँसते हुए उसने म्यान से उत्तम तलवार निकालकर अपने सारथि से कहा—रथ को शीघ्र इन्द्र के पास ले चलो।
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