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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 43
इतीरयत्युग्रतरं महासुरे महाकृपाणं कलयत्यलं कुधा । परस्परोत्पीडितजानवो भयान्नभश्चरा दूरतरं विदुद्रुवुः ॥
इस प्रकार उग्र वचन कहते हुए और क्रोध से तलवार उठाते हुए उस महादैत्य को देखकर आकाशचारी भय से दूर भाग गए।
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