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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 41
कटुस्वरैः प्रालपथाम्बरस्थिताः शिशोर्बलात्यङ्गिनजातकस्य किम् । श्वानः प्रमत्ता इव कार्तिके निशि स्वैरं वनान्ते मृगधूर्तका इव ॥
हे आकाशवासी! तुम तीखे स्वर में व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? उस बालक की शक्ति क्या है? जैसे कार्तिक मास की रात्रि में उन्मत्त कुत्ते जंगल में भौंकते हैं, वैसे ही तुम भी व्यर्थ प्रलाप कर रहे हो।
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