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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 40
किं बूथ रे व्योमचरा महासुराः स्मरारिस्नुप्रतिपक्षवर्तिनः । मदीयबाणव्रणवेदना हि साऽधुना कथं विस्मृतिगोचरीकृता ॥
हे आकाशवासी! तुम क्या कहते हो? क्या तुमने मेरे बाणों के घावों की पीड़ा को भूल लिया है कि अब स्मरारि के पुत्र के पक्ष में बोल रहे हो?
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