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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 39
श्रुत्वेति वाचं वियतो गरीयसीं क्रोधादहङ्कारपरो महासुरः । प्रकम्पिताशेषजगत्त्रयोऽपि सन्नकम्पतोच्चैर्दिवमभ्यधाञ्च सः ॥
इस आकाशवाणी को सुनकर भी वह महादैत्य क्रोध और अहंकार से भर गया और समस्त जगत को कंपित करता हुआ ऊँचे स्वर में आकाश की ओर बोला।
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