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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 35
अभ्रंलिहैः शृङ्गशतैः समन्ततो दिक्कक्रवालैः स्थगितस्य भूभृतः । क्रौञ्चस्य रन्ध्र विशिखेन निर्ममे येनाहवस्तस्य सह त्वया कुतः ॥
जिसने अपने बाण से चारों ओर पर्वतों से घिरे क्रौंच पर्वत में भी छेद कर दिया, उसके साथ तुम्हारा युद्ध कैसे संभव है?
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