इत्याद्यरिष्टैरशुभोपदेशिभिर्विहन्यमानोऽप्यसुरः पुनः पुनः । यदा मदान्धो न गतान्यवर्तताम्बरात्तदाभून्मरुतां सरस्वती ॥
इस प्रकार अनेक अपशकुनों से बार-बार रोके जाने पर भी, जब मदांध असुर नहीं रुका, तब आकाश से वायु की वाणी प्रकट हुई।
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