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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 31
रथाश्वकेशावलिकर्णचामरं ददाह बाणासनबाणबाणधीन् । अकाण्डतश्चण्डतरो हुताशनस्तस्यातनुस्यन्दनधुर्यगोचरः ॥
अचानक प्रचंड अग्नि प्रकट होकर उसके रथ, घोड़े, केश, कानों के चामर और धनुष-बाण आदि को जलाने लगी, जो उसके रथ के समीप ही फैल गई थी।
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