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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 30
सद्यो निकृत्ताञ्जनसोदरद्युतिं फणामणिप्रज्वलदंशुमण्डलम् । निर्यद्विषोल्कानलगर्भफूत्कृतं ध्वजे जनस्तस्य महाहिमैक्षत ॥
लोगों ने उसके ध्वज पर ऐसा दृश्य देखा जिसमें सर्पमणियों की ज्योति से युक्त, विषाग्नि उगलता हुआ, मानो अभी-अभी कटे हुए अंजन के समान भयंकर प्रकाश फैल रहा था।
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