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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 28
विजानता भावि शिरो निकृन्तनं प्रज्ञेन शोकादिव तस्य मौलिना । मुहुर्गलद्भिस्तरलैरलन्तरामरोदि मुक्ताफलवाष्पबिन्दुभिः ॥
मानो उसका मस्तक अपने भविष्य के छेदन को जानकर शोक में डूब गया हो, उसके मुकुट से मोती जैसे आँसू बार-बार गिरने लगे।
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