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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 27
क्षितौ निरस्तं प्रतिकूलवायुना तदीयचामीकरधर्मवारणम् । रराज मृत्योरिव पारणाविधी प्रकल्पितं हाटकभाजनं महत् ॥
विपरीत वायु से उसका स्वर्णमय छत्र भूमि पर गिर पड़ा, जो मानो मृत्यु के स्वागत के लिए रखा गया स्वर्णपात्र प्रतीत हो रहा था।
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