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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 24
ऊर्धीकृतास्या रविदत्तदृष्टयः समेत्य सर्वे सुरविद्विषः पुरः । श्वानः स्वरेण श्रवणान्तशातिना मिथो रुदन्तः करुणेन निर्ययुः ॥
मुख ऊपर उठाकर सूर्य की ओर देखते हुए कुत्ते एकत्र होकर करुण स्वर में रोने लगे, जिसकी ध्वनि कानों को विदीर्ण करने वाली थी।
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