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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 19
दिवापि तारास्तरलास्तरस्विनीः परापतन्तीः परितोऽथ वाहिनीः । विलोक्य लोको मनसा व्यचिन्न्तयत्प्राणव्ययान्तं व्यसनं सुरद्विषः ॥
दिन में भी चारों ओर टूटते हुए तारों को देखकर लोगों ने मन ही मन विचार किया कि यह असुरों के प्राणों के नाश का संकेत है।
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