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कुमारसंभवम् • अध्याय 15 • श्लोक 10
चमूरजः प्राप दिगन्तदन्तिनां महासुरस्याभिसुरं प्रसर्पिणः । दन्तप्रकाण्डेषु सितेषु शुभ्रतां कुम्भेषु दानाम्बुधनेषु पङ्कताम् ॥
सेना की धूल दिशाओं के हाथियों के दाँतों पर फैलकर उन्हें श्वेत बना रही थी और उनके मदजल से भरे कुंभों में जाकर कीचड़ का रूप धारण कर रही थी।
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